भारत में वर्ष 2026 में छात्रों और युवाओं से जुड़े कई बड़े आंदोलन देखने को मिले हैं। इनमें दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुआ छात्र आंदोलन और झारखंड की राजधानी रांची में चल रहा छात्र आंदोलन खास चर्चा में है।
पहली नजर में दोनों आंदोलनों की वजह एक जैसी लग सकती है, क्योंकि दोनों में परीक्षा व्यवस्था, कथित अनियमितताओं और युवाओं के भविष्य से जुड़े सवाल उठाए गए हैं। लेकिन अगर दोनों आंदोलनों को करीब से देखा जाए तो इनके मुद्दे, लक्ष्य, प्रदर्शनकारियों की उम्र, मांगें और आंदोलन का स्वरूप काफी अलग हैं।
दिल्ली का छात्र आंदोलन किस मुद्दे पर था?
दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुआ आंदोलन मुख्य रूप से NEET और राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगी परीक्षा व्यवस्था में कथित अनियमितताओं को लेकर था।
इस आंदोलन में बड़ी संख्या में युवा और Gen-Z छात्र शामिल हुए। प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांगों में परीक्षा प्रक्रिया में पारदर्शिता, कथित पेपर लीक और अनियमितताओं की जांच तथा तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग शामिल थी।
दिल्ली का आंदोलन राष्ट्रीय स्तर का मुद्दा बन गया क्योंकि NEET देशभर के लाखों विद्यार्थियों के मेडिकल करियर से जुड़ी परीक्षा है। इसलिए इसका प्रभाव केवल दिल्ली या किसी एक राज्य तक सीमित नहीं रहा।
झारखंड में क्यों हो रहा है छात्र आंदोलन?
झारखंड में चल रहा आंदोलन मुख्य रूप से JPSC और JSSC की भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर है।
रांची के जयपाल सिंह स्टेडियम में बड़ी संख्या में नौकरी के अभ्यर्थी धरने पर बैठे हैं। आंदोलन का नेतृत्व छात्र नेता देवेंद्र नाथ महतो समेत कई छात्र प्रतिनिधि कर रहे हैं।
प्रदर्शनकारी 14वीं JPSC सिविल सर्विस परीक्षा, JSSC-CGL और अन्य भर्ती परीक्षाओं में कथित गड़बड़ियों की जांच की मांग कर रहे हैं।
छात्रों की प्रमुख मांगों में संबंधित परीक्षाओं को रद्द करना और स्वतंत्र जांच कराना शामिल है। कई प्रदर्शनकारी CBI या राज्य से बाहर के सेवानिवृत्त हाईकोर्ट न्यायाधीशों के पैनल से जांच की मांग कर रहे हैं।
दिल्ली और झारखंड के आंदोलन में सबसे बड़ा अंतर क्या है?
दोनों आंदोलनों को केवल "छात्र आंदोलन" कह देना पर्याप्त नहीं होगा। दोनों की प्रकृति में महत्वपूर्ण अंतर है।
1. आंदोलन का मुख्य मुद्दा
2. आंदोलन का स्तर
दिल्ली का आंदोलन मुख्य रूप से राष्ट्रीय स्तर का मुद्दा बन गया था, क्योंकि NEET पूरे देश में आयोजित होने वाली परीक्षा है।
इसके विपरीत झारखंड का वर्तमान आंदोलन मुख्य रूप से राज्य की भर्ती व्यवस्था और झारखंड के अभ्यर्थियों के रोजगार से जुड़ा हुआ है।
3. प्रदर्शनकारियों की उम्र और प्रोफाइल
वहीं रांची के आंदोलन में बड़ी संख्या में 25 वर्ष से अधिक उम्र के नौकरी अभ्यर्थी शामिल हैं। इसका कारण यह है कि JPSC और JSSC जैसी परीक्षाएं सरकारी नौकरियों में प्रवेश से जुड़ी हैं।
4. मांगों में अंतर
दिल्ली के प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांग परीक्षा व्यवस्था में जवाबदेही और राष्ट्रीय स्तर पर कार्रवाई से जुड़ी थी।
झारखंड के प्रदर्शनकारियों की मांग अधिक राज्य-विशिष्ट है। वे कुछ परीक्षाओं को रद्द करने और कथित अनियमितताओं की स्वतंत्र जांच की मांग कर रहे हैं।
10 अगस्त 2026 को झारखंड में छात्रों ने विधानसभा की ओर मार्च की योजना भी बनाई थी। सरकार और छात्रों के बीच बातचीत के बावजूद CGL परीक्षा में CBI जांच की मांग पर सहमति नहीं बन सकी।
झारखंड सरकार का क्या कहना है?
झारखंड सरकार ने छात्रों की शिकायतों को गंभीरता से लेने की बात कही है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने बातचीत के जरिए समाधान निकालने की बात कही और कहा कि सरकार छात्रों की चिंताओं पर गंभीरता से विचार कर रही है।
सरकार की ओर से कुछ परीक्षाओं को रद्द करने पर सहमति की बात सामने आई है, लेकिन CGL परीक्षा को रद्द करने और CBI जांच की मांग पर विवाद बना हुआ है।
सरकार ने CBI जांच की जगह सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में न्यायिक जांच का प्रस्ताव भी रखा है, जबकि प्रदर्शनकारी CBI जांच की मांग पर कायम हैं।
दिल्ली आंदोलन का परिणाम क्या रहा?
इससे दिल्ली आंदोलन को राष्ट्रीय राजनीति और शिक्षा व्यवस्था से जोड़कर देखा गया।
क्या दोनों आंदोलनों को एक जैसा माना जा सकता है?
नहीं।
हालांकि दोनों आंदोलनों में परीक्षा व्यवस्था और युवाओं के भविष्य को लेकर नाराजगी दिखाई देती है, लेकिन उनकी परिस्थितियां अलग हैं।
दिल्ली आंदोलन का फोकस राष्ट्रीय परीक्षा व्यवस्था और NEET से जुड़ा था, जबकि झारखंड आंदोलन का फोकस राज्य की सरकारी भर्ती परीक्षाओं और नौकरी की प्रक्रिया पर है।
एक तरफ दिल्ली में मेडिकल कॉलेज में प्रवेश की तैयारी कर रहे युवाओं का बड़ा वर्ग आंदोलन से जुड़ा था, तो दूसरी तरफ झारखंड में सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे अभ्यर्थी आंदोलन कर रहे हैं।
लेकिन दोनों आंदोलनों में एक समानता भी है
दोनों आंदोलनों के केंद्र में एक ही बड़ा सवाल दिखाई देता है—
अगर परीक्षा प्रणाली पर भरोसा नहीं रहेगा तो मेहनत करने वाले छात्रों और अभ्यर्थियों के भविष्य का क्या होगा?
भारत में लाखों युवा वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। इसके लिए परिवार पैसा खर्च करते हैं और विद्यार्थी अपना कई साल का समय लगाते हैं।
ऐसे में पेपर लीक, परीक्षा में कथित गड़बड़ी, परिणामों को लेकर विवाद या भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी केवल एक परीक्षा की समस्या नहीं होती। इसका सीधा असर युवाओं के भविष्य और सरकारी संस्थाओं पर उनके भरोसे पर पड़ता है।
निष्कर्ष
दिल्ली और झारखंड के छात्र आंदोलनों को एक ही नजरिए से देखना सही नहीं होगा।
दिल्ली का आंदोलन राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा और NEET से जुड़े मुद्दों पर केंद्रित था, जबकि झारखंड का आंदोलन JPSC, JSSC और राज्य की सरकारी भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं के खिलाफ है।
दोनों आंदोलनों की मांगों में अंतर है, लेकिन दोनों के पीछे युवाओं की एक बड़ी चिंता समान है—मेहनत और योग्यता के आधार पर निष्पक्ष अवसर मिलना।
झारखंड में आंदोलन अभी भी जारी रहने और विधानसभा मार्च जैसे कार्यक्रमों के कारण यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार और प्रदर्शनकारी छात्रों के बीच बातचीत से कोई स्थायी समाधान निकलता है या नहीं। 10 अगस्त 2026 को प्रस्तावित विधानसभा मार्च से पहले पुलिस ने भी कहा है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन की स्थिति में कार्रवाई नहीं की जाएगी।
आखिरकार, परीक्षा केवल एक प्रश्नपत्र नहीं होती। लाखों युवाओं के लिए वह उनके भविष्य, करियर और वर्षों की मेहनत का रास्ता होती है। इसलिए परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता, निष्पक्षता और जवाबदेही किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए बेहद जरूरी है।